Friday, February 10, 2012

गड्ड-मड्ड कविता ...

एक दिन, मैंने गुस्से-गुस्से में
सादा कागज़ पर
गोदा-गादी
अंड-संड
अगड़म-बगड़म
लाल-पीला, हरा-नीला
जैसा, कुछ गड्ड-मड्ड कर दिया !
अब कर दिया तो कर दिया !!
फिर, अचानक
एक दिन, एक साहब की नजर
गड्ड-मड्ड पर पडी !
पडी क्या, उन्होंने पीठ थप-थपाई !
और कहा -
क्या पैनी, धारदार कविता है !
फिर क्या था, बस उसी दिन से
अपुन ... कवि बन गया हूँ !!

10 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

रंगीनियत में धार है..

Murari Pareek said...

gadd madd se hi banti kavitaa man ke bhaaw gaad maad me hi hote hai...

रश्मि प्रभा... said...

waah........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर की जाएगी!
सूचनार्थ!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

यह तो हो गयी कविता में (की) ऐसी-तैसी

अरूण साथी said...

yahi sahi he....jay ho

Rajesh Kumari said...

aapki yeh gadd madd kavita chal nikli.

Shanti Garg said...

बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत खूब...

रचना दीक्षित said...

यह कविता तो काफी मनोरंजक भी है. जय हो गड्ड मड्ड कविता की.