Friday, May 26, 2017

फरेबी

कौन जानता था कि
वो
कुछ इस तरह मिजाज बदल लेंगे

पहले तो ..
घंटों लिपटे रहेंगे
दो जिस्म औ इक जान की तरह

और फिर
मुँह मोड़ लेंगे
इक अजनबी की तरह

लिपटना .. मुँह मोड़ लेना .. फिर .. पहचानना नहीं
कभी-कभी तो
उनकी इस अदा पे भी प्यार आता है

मगर सोचता हूँ
ऐसे प्यार का मतलब ही क्या .. !
जो
फरेबी हो ... ?

Thursday, May 25, 2017

गुस्ताख

सिक्का ...
था बड़ा गुस्ताख
हमने माँगा चित्त .. औ वो पट्ट आ गया,

कुछ .. इस तरह ...
उछल-कूद में
जीवन का बंठाधार गर गया,

अब .. हार क्या .. और जीत क्या ....
जो हुआ .. सो हुआ
सब .. गुड़ का गोबर कर गया,

सिक्का ..
था बड़ा गुस्ताख ...
कभी राह बदल गया .. तो कभी चाह बदल गया .. !

( नोट - वैसे तो सिक्का अपने आप में पूर्ण भाव के साथ  होता है ... लेकिन .. यहाँ सिक्का .. भाग्य औ वक्त का भाव भी अपने साथ लिए हुए है ... अर्थात सिक्का के स्थान पर भाग्य / वक्त भी पढ़ा व महसूस किया जा सकता है ... ! )

Thursday, May 18, 2017

माथाफोड़ी

माथाफोड़ी ... ?
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हिन्दी में सिर्फ वे लोग ही अच्छा नहीं लिखते
जो नामी-गिरामी हैं
वे लोग भी अच्छा लिखते हैं
जिनका कोई नामो-निशान नहीं है,

सिर्फ वे लोग ही
हाइवे, रास्ते, पगडंडी नहीं बना रहे
जो छप रहे हैं, छापे जा रहे हैं
वे लोग भी
राह दिखा रहे हैं, लकीरें खींचते जा रहे हैं
जो छप नहीं रहे,

लेखन की लकीरें
कितनी अमिट हैं, कितनी झंकझोरने वाली हैं
इसका निर्धारण
वे आलोचक, समालोचक, समीक्षक तय नहीं करेंगे
जो हाथों पे परोसी जा रही लेखनी पर
अपने हस्ताक्षर कर रहे हैं,

लेखनी कितनी पैनी है, धारदार है
किसकी उन्नीस .. किसकी बीस .. किसकी इक्कीस है
यह परखने के लिए, देखने के लिए
निःसंदेह ...
एयरकंडीशन में बैठे लोगों को
लू के थपेड़ों संग साक्षात्कार करते हुए
माथाफोड़ी .. माथापच्ची ... करनी पड़ेगी
वर्ना ... ???

~ श्याम कोरी 'उदय'

Sunday, May 14, 2017

एक-चालीस की आखिरी लोकल ... !

अक्सर छूट जाती हैं
बहुतों की
एक-चालीस की आखिरी लोकलें,

फिर स्टेशन के ...
अंदर .. बाहर
मंडराने ... के सिबाय ..
उनके पास ... कुछ बचता नहीं है,

कुछ पश्चाताप ..
कुछ प्रायश्चित ..
भी साथ होता है .. जो ...
दिमाग को झंकझोरते रहता है,

इसी बीच ..
कुछ कोमा में चले जाते हैं
तो कुछ .. अर्द्ध-विक्षिप्त हो जाते हैं,

बहुत बुरी स्थिति हो जाती है
मन की .. तन की ...
एक-चालीस की आखिरी लोकल छूट जाने से,

वो इसलिये कि -
मेल .. एक्सप्रेस .. सुपर-फास्ट .. इत्यादि ...
पहले ही छूट चुकी होती हैं ... !!!

( नोट - यहाँ आखिरी लोकल से अभिप्राय आखिरी प्रेमिका से है .. हुआ दरअसल ये कि दो दिन पहले मेरे एक मित्र की आखिरी प्रेमिका की शादी हो गई ... बातचीत के दौरान जब मुझे पता चला तो मेरे जेहन में मुम्बई की आखिरी लोकल बिजली की तरह कौंध पडी ... फिर लिखते लिखते .. बाद के हालात पे एक कविता बन गई ... जो आपके समक्ष प्रस्तुत है .... )

Saturday, May 13, 2017

कर्जदार हैं .. पर ... भगोड़े नहीं हैं !!

हाँ .. हम ... औघड़ हैं .. फक्कड़ हैं
किसान हैं ... मजदूर हैं ...
पर ..
किसी बैंक के भगोड़े नहीं हैं,

गाँव ... खलिहान ...
पीपल तले ..
तो कभी .. नदी के तट पे ...
हर पल .. हर क्षण ... हाजिर खड़े हैं,

देश छोड़ के चले जाएँ
हम .. ऐसे व्यापारी नहीं हैं
हाँ .. हम ...
कर्जदार हैं .. पर ... भगोड़े नहीं हैं !!