Sunday, October 26, 2014

लजीज ...

कुछ इस कदर, कुछ इस तरह का, गुमाँ है उन्हें 'उदय'
शाम, शमा, दीप, रौशनी, सब खुद को समझते हैं वो ?
सच ! तेरे इल्जामों से, हमें कोई परहेज नहीं है
हम जानते हैं, तू आज भी मौक़ा न चूकेगी ??
न ठीक से वफ़ा - न ठीक से बेवफाई
उनकी इस अदा पर भी मर मिटने को जी करता है ?
… 
अब तुम, मजबूरियों को, वफ़ा का नाम न दो 
सच क्या है, ये तुम जानते हो, हम जानते हैं ? 
… 
सिर्फ एक तुझसे अब तक मिजाज नहीं मिल पाये हैं अपने 
वर्ना किसी से भी तू पूंछ कर देख कितने लजीज हैं हम ??

Friday, October 24, 2014

कच्ची बुनियाद ...

वक्त के साथ बदलने को वो तैयार नहीं थे 'उदय' 
उफ़ …सच …लो, अब वक्त बदल रहा है उन्हें ?
… 
न रंज…न गम…न गिला…न शिकवा  
मुहब्बत अपनी कुछ ऐसी ही है 'उदय' ? 
… 
अक्सर …
रूठ जाते हैं - टूट जाते हैं 
रिश्ते, घरौंदे, दिल, 
कच्ची बुनियाद के ?
… 
तू इक बार रूठ के तो देख 
गर न मना लूँ तो कहना ? 
… 
सच ! आज यहां, कल वहां, तो परसों कहीं और होंगे 
हम मुसाफिर हैं 'उदय', सफर ही अपनी जिंदगी है ? 
 

Saturday, October 18, 2014

हुनर / वफ़ा / जाल / कर्म ...

01 -

गर कोई हुनर सीखना है 
तो 
तुम हमसे सीखो 
क्या रंग, 
क्या गुलाटी, 
औ क्या मौक़ा परस्ती ?
… 
02 - 

यकीनन यकीन है तुम पर 
तुम ... 
वफ़ा करो न करो, 
पर...... बेवफाई न करोगे ? 
… 
03 -

काश ! हम भी होते, तुम जैसे 
तो … 
जरूर 
एक बार 
कोशिश करते 
जमीं से आसमां तक 
एक, अनोखा जाल बुनने की ? 
… 
04 - 
मौज भी अपनी है, औ मस्ती भी है अपनी 
कर्म भी अपने हैं 
औ भूमि भी है अपनी, 
 
आओ … चलें … बढ़ें … ढूंढें … 

हीरे-मोती … हम, अपनी ही जमीं में 
और, करें साकार … कर्म … अपने-अपने !