Sunday, December 4, 2016

ये तूने क्या कर दिया राजन ... !

कहीं भी धूप नहीं है
कहीं भी छाँव नहीं है

ये तूने क्या कर दिया राजन ...

कहीं खुशियों सा शोर नहीं है
कहीं मातम सा सन्नाटा नहीं है

लोग ज़िंदा हैं, या मर गए हैं
कोई आहट नहीं है

लोग हो रहे हैं नोट, हजार के, पाँच सौ के
पर कहीं कोई सौदाई नहीं हैं

ये तूने क्या कर दिया राजन ...

बस्तियों, शहरों, गलियों, मोहल्लों में
कहीं को भेद नहीं है ..... ?

~ श्याम कोरी 'उदय'

Friday, November 18, 2016

तमाशा ... !

तू कोई सबक सिखा
उसे या मुझे
या तो वो चेत जाए, या फिर मैं

रोज रोज
उसका गुब्बारे फुलाना, और मेरा उन्हें फोड़ देना
अब दर्शकों को भी रास नहीं आ रहा है

तालियों की गूँज ... दिन-ब-दिन ..
कम होते जा रही है
अब किसी नए तमाशे की जरुरत है ... ?

~ श्याम कोरी 'उदय'

Sunday, November 13, 2016

त्राहिमाम्-त्राहिमाम्

जिंदगी को दांव पे लगा दो
पूरा गाँव अपना है
हा-हा-कार मचे, या त्राहिमाम्-त्राहिमाम्
मचने दो,

हम सरपंच हैं
गाँव के,
हम मुखिया हैं
बस्ती के,

जो चाहेंगे वो करेंगे
लोग रोयें रोते रहें, मरते हैं मरते रहें
वैसे भी ... लोगों की आदत है ...
बात-बात पे रोने की .... ???

Tuesday, November 8, 2016

मधुशाला

आ, चल, बैठें, देखें,
है कितनी .. कड़वी-मीठी .. मधुशाला ...
बिना चखे
हम कैसे कह दें, है पसंद नहीं हमें मधुशाला,

भीड़ लगी तुम देखो कितनी
संग पी रहे .. हिन्दू-मुस्लिम ..
अमीर-गरीब ...
मिल-बाँट कर ... मधुशाला ....

छोड़, उतार, अहं का चोला
चल, जांचें, परखें, मधुशाला ...
बिना चखे
हम कैसे कह दें, है पसंद नहीं हमें मधुशाला !

~ श्याम कोरी 'उदय'

Friday, October 28, 2016

अपने ही बुझा रहे थे घर के चिराग को ... ?

सच 'उदय', खूब बांटी गईं रेवड़ियाँ
पर.. किसी का मुंह मीठा न हुआ ?
...
चेले-चपाटे औ साहूकार करने लगें जब गुणगान
तब समझ लो 'उदय'... बहुत जल्द है बंठाधार ?
...
पहले चवन्नी-अठन्नी की भी शान थी
मगर अफसोस 'उदय',
आज ...... पांच-दस के नोटों का भी
कहीं कोई वजूद नहीं है ?
...
कहाँ कोई गैर था .. कहाँ कोई बेगाने थे
अपने ही बुझा रहे थे घर के चिराग को ?
...
उफ़ ! हिम्मत की तुम दरिंदगी तो देखो 'उदय'
कोई ताक में था.. कोई हाथ मलते रह गया ?