Thursday, February 2, 2017

फरेबी ...

सच ! आज फिर .. वो हमें .. कुछ याद से आ गए
पता नहीं, रूठ के हमसे... वो किस हाल में होंगें ?
...
सच ! आज जरुरत नहीं है आसमां में सुरागों की
कुछ पत्थर जमीं पर ही तबियत से उछालो यारो ?
...
न खता थी, न कुसूर था, मगर अफसोस 'उदय'
'खुदा' भी अब खामोश है.. सजा देने के बाद ?
...
वक्त गुजरा, कारवाँ गुजरा, अब तो गुबार भी गुजर गया
उफ़ ... मगर खामोशियाँ उनकी 'उदय' ..... ठहरी रहीं ?
...
न दिलों की बात कर, न जुबाँ की बात कर
सच 'उदय' .. हर राह .. वो फरेबी निकले ?

Friday, December 9, 2016

पश्चाताप .... आत्मग्लानी ..... !

आओ, चलें, लिखें, कुछ ...
नंगी दीवारों पर

कुछ ... सत्य लिखें
कुछ ... धर्म लिखें
कुछ ... कर्म लिखें
कुछ ... कथनी-औ-करनी लिखें

राहगीरों के काम आयेंगीं
लिखी बातें ...

शायद किसी दिन काफिला गुजरे
'साहब' का ...

'साहब' की .. नजर पड़े .. किसी दीवार पे
पढ़कर ... मन व्याकुल हो जाए

2-3 घड़ी को सही ...
पश्चाताप हो .... आत्मग्लानि हो ..... !

~ श्याम कोरी 'उदय'

Sunday, December 4, 2016

ये तूने क्या कर दिया राजन ... !

कहीं भी धूप नहीं है
कहीं भी छाँव नहीं है

ये तूने क्या कर दिया राजन ...

कहीं खुशियों सा शोर नहीं है
कहीं मातम सा सन्नाटा नहीं है

लोग ज़िंदा हैं, या मर गए हैं
कोई आहट नहीं है

लोग हो रहे हैं नोट, हजार के, पाँच सौ के
पर कहीं कोई सौदाई नहीं हैं

ये तूने क्या कर दिया राजन ...

बस्तियों, शहरों, गलियों, मोहल्लों में
कहीं को भेद नहीं है ..... ?

~ श्याम कोरी 'उदय'

Friday, November 18, 2016

तमाशा ... !

तू कोई सबक सिखा
उसे या मुझे
या तो वो चेत जाए, या फिर मैं

रोज रोज
उसका गुब्बारे फुलाना, और मेरा उन्हें फोड़ देना
अब दर्शकों को भी रास नहीं आ रहा है

तालियों की गूँज ... दिन-ब-दिन ..
कम होते जा रही है
अब किसी नए तमाशे की जरुरत है ... ?

~ श्याम कोरी 'उदय'

Sunday, November 13, 2016

त्राहिमाम्-त्राहिमाम्

जिंदगी को दांव पे लगा दो
पूरा गाँव अपना है
हा-हा-कार मचे, या त्राहिमाम्-त्राहिमाम्
मचने दो,

हम सरपंच हैं
गाँव के,
हम मुखिया हैं
बस्ती के,

जो चाहेंगे वो करेंगे
लोग रोयें रोते रहें, मरते हैं मरते रहें
वैसे भी ... लोगों की आदत है ...
बात-बात पे रोने की .... ???