Tuesday, July 29, 2014

ये दिल्ली है ...

कुछ इस तरह का है नाता हमारा
वो यादों में हैं औ हम साये में हैं ?
गर कोई दीवार है बीच हमारे, तो उसे गिरा दो
हम हिन्दोस्तानी हैं, हिन्दू-मुसलमान नहीं हैं ?
फिर वही जख्म, फिर वही मल्हम
क्यूँ इक बार खंजर उतार नहीं देते ?

भटक रहे हैं, कुछ देर और भटकेंगे
फिर हम भी, ठिये पे मिल जाएंगे ?
ये दिल्ली है, दिल्ली की दुकानें हैं 'उदय'
यहाँ कुछ सस्ता, तो कुछ मंहगा है ??
...

Sunday, July 27, 2014

आशिकी ...

अब हम इतने भी बेखबर नहीं हैं 'उदय'
जानते हैं,
आशिकी में …
अक्सर,
कभी-कभी,
हवा के झौंके भी झटके दे देते हैं ?
पर क्या करें,
मजबूर हैं,
लाचार हैं,
आशिकी जो कर बैठे हैं हम उनसे ???

Friday, July 25, 2014

ठेका ...

कीमत तय करो, हमें हर कीमत पे सौदा मंजूर है
आखिर तुम,… ईमान का सौदा कर रहे हो यार ?
बात को, अब तुम, इतनी भी, बेबाकी से मत कहो यारा
जज्बात पत्थर के सही पर दिल तो शीशे के ही हैं उनके ?

अब कोई कुछ नहीं उखाड़ सकता
पूरे पांच साल का ठेका है हमारा ?
खूब तरसा तरसा के बरस रहे हैं हुजूर
'रब' जाने, वो इत्ते नाराज किस्से हैं ?
 …
इसे 'रब' की मेहरवानी कहें, या 'खुदा' के रहम
जलजलों के दौर में भी हम सलामत हैं यारो ?