Saturday, December 20, 2014

औघड़-फक्कड़ ...

चलो निपट गया
एक……… और कुंभ
कुछेक स्वयम्भुओं …
को पुण्य मिल गया ?

आज, तमाम अपराधी संदेही हैं, या फरार हैं
अब और, ………… हम क्या कहें 'उदय' ?
सच ! न टोपी, न टीका, न माला, न टोटके
हम कैसे मान लें 'उदय', कि तुम ज्ञानी हो ?
....
क़ुबूल हों तुम्हें …
तमगे, दुशाले औ समारोहों की चका-चौंध
हम ! …… हम तो ठहरे औघड़-फक्कड़ ?


Tuesday, December 16, 2014

कुचल दें ...

कोमल पंखुड़ियाँ मसल दी हैं
कल …
कुछ जालिमों ने,


तब से अब तक
रोम तक कंप-कंपा रहे हैं मेरे,

करूँ तो क्या करूँ …
मैं अकेला हूँ,

चलो मिलकर …
कुचल दें
हुकूमत जालिमों-जल्लादों की ?

Monday, December 8, 2014

हौले हौले

उनके, रंज-औ-गम दोनों फर्जी हैं
सच ! वो बहुत बड़े नकलची हैं ?
… 
सच ! चित्त भी उनकी है, औ पट्ट भी उनकी
बस, खड़े सिक्के पे उनका जोर नहीं चलता ?
.... 
गर जिंदगी शराब है, तो तू मैकदा है
बता, छक कर पियें, या हौले हौले ?

हाईकू
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जो तू कहे …
ओढ़ लूँ, 
या बिछा लूँ ?