Thursday, July 28, 2016

चल ... छोड़ .. जाने दे उसे ..... ?

चल ... छोड़ .. जाने दे उसे
गर ... परवाह नहीं है .. उसे .. तेरी

तो फिर ... तू क्यूँ .. रो-बिलख रहा है
तड़फ रहा है ..
अंदर ही अंदर .. सिमट रहा है

देख .. उधर ... दूर ...
खिडक़ी से .. कोई .. तुझे देख रहा है

छोड़ .. जज्बात अपने
पहचान ... जज्बात उसके ...

जो ... दूर .. कहीं खिड़की से ..
तुझे .. चाह रहा है ...

उम्मीदों की आस लिए ..

मन ही मन .. दिल-ही-दिल ...
तुझे ... पुकार रहा है ... ?

चल ... छोड़ .. जाने दे उसे ..... ??

~ श्याम कोरी 'उदय'

Wednesday, July 27, 2016

तुम मानो ... या न मानो ... ?

चाहो तो भी
न चाहो तो भी

शहर के रंग में
खुद को ... रंगना पड़ता है
हवाओं के संग में उड़ना पड़ता है

यही दस्तूर हैं
यही रिवाज हैं

जमाने के ...
कुदरत के ...
तुम मानो ... या न मानो ... ?

~ श्याम कोरी 'उदय'

Sunday, July 24, 2016

सच ... सच है ... ईश्वर है ... ?

सच तो सच होता है
लोग ... मानें ..... या न मानें
लोग.. सुनें या न सुनें.. या अनसुनी कर दें

सच ... दीवार पे लिखा हो
चट्टान पे लिखा हो
या जुबाँ ... या दिलों पे .....

लोग पढ़ रहे थे
पढ़ रहे हैं
पढ़ते रहेंगे ...

क्यों ? ...
क्योंकि .. सच ... सच है
और... सच ही रहेगा

तुम्हें मानना पडेगा
उन्हें मानना पडेगा
हमें ... हम सब को मानना पडेगा

सच ... कड़वा है ... या मीठा है
तीखा है ... या फीका है ...
इन सब ..... सवालों से परे है

क्योंकि ... सच ... सच है ...
जो.. अमिट है ... अमर है ... नश्वर है ...
सच ... सच है ... ईश्वर है ... ???

~ श्याम कोरी 'उदय'

Saturday, July 16, 2016

हाँ .. हम ... कश्मीर हैं ...... ?

क्यों .... क्यों करें ... हम शर्म ?
जाओ ... नहीं करना
तुम्हें ... जो सोचना है सोचो ...

जो करना है करो
जो कर सकते हो .. वो करो ..

और ..
जो हमें अच्छा लगता है .. लग रहा है ..
वो .. हमें करने दो

हम नहीं करेंगे शर्म
हमें ... नहीं आयेगी शर्म ?

क्यों ?..... क्योंकि ......
हम जन्मजात आतंक के समर्थक हैं
आतंकियों के समर्थक हैं

आतंक .. हमारा फैशन ... पैशन है ..
हुनर है .... दीवानगी हैं ..

या .. यूँ समझ लो
आतंक ही हमारा धर्म है

हमारे लहू में .. हमारी धड़कनों में ..
आतंक .. दौड़ रहा है .. धड़क रहा है

हाँ .. हम ... कश्मीर हैं ...... ???

~ श्याम कोरी 'उदय'

Tuesday, July 5, 2016

देव बनें ... शैतान नहीं ... !

चलो हो जाएँ रथ पे सवार
बन जाएँ ...
हो जाएँ ... जगन्नाथ ...

करें संहार ...
दुष्टों औ पापियों का

बनें पालनहार ...
असहायों औ निर्बलों का

यही प्रण करें ...
यही पग बढ़ें ...
यही पथ चुनें ...

देव बनें ... शैतान नहीं ...
चलो ... चलें ... बनें ...
जगन्नाथ... जगन्नाथ ... जगन्नाथ ... ?

~ श्याम कोरी 'उदय'