Monday, November 20, 2017

लोकतंत्र ... !

कुछ खामोश हैं, कुछ बड़-बड़ा रहे हैं
कुछ आँखें मिच-मिचाए बैठे हैं,

कुछ तमाशे दिखा रहे हैं, कुछ देख रहे हैं
कुछ मूकदर्शक हैं,

कुछ तमगे बांट रहे हैं, कुछ बटोर रहे हैं
कुछ इंतज़ार में दंडवत हैं,

पर .. फिर भी ... चंहूँ ओर ....
शोर है .. सन्नाटा है ... लोकतंत्र है .... ?

~ श्याम कोरी 'उदय'

Friday, October 20, 2017

एक शब्द ...

लोग ..
न जाने .. क्या-क्या लिख देते हैं
और मुझसे .. एक शब्द लिखा नहीं गया


प्रेम
आस्था
विश्वास
समर्पण
बगैरह-बगैरह ..
लिखने की मेरी तमाम कोशिशें नाकाम रहीं

एक शब्द
अब तक .. अपूर्ण है
कोशिशें .. आज भी जारी हैं
शायद ..
किसी क्षण, किसी पल ... पूर्ण हो जाए .... !

Saturday, September 30, 2017

सच .. मैं .. रावण हूँ ... !

अबे .. चूजो ...
घोंचुओ ...
भोंपुओ ...
पप्पुओ ... चप्पुओ ...

रात-दिन .. दुम हिलाने वाले टट्टुओं ...
अब तुम ...
राम बनने की कोशिश ... न करो ....

क्या तुम मेरे पुतले को जलाकर राम बन जाओगे ???

सुबह-शाम .. तलुए चाँटने वाले स्वयं-भू सूरमाओ
क्या तुम्हें तनिक भी शर्म नहीं है ... ?
क्या तुम्हारे अंदर का खून पानी हो गया है ... ?
क्या तुम्हारा जमीर मर गया है ... ?

जो तुम .. मेरे पुतले के सामने ... सीना ताने खड़े हो
जलाओ ...
चलाओ तीर ...
फूंक दो .. मुझे .... और ...
अकड़ के खड़े रहो .. बिना रीढ़ वालो ..... !!

शायद .. तुमसे ...
भृष्टाचारियों ... मिलावटखोरों .... ठगों .....
ढोंगियों .. पाखंडियों .. के विरुद्ध .. कुछ होगा भी नहीं ...

क्यों ? ... क्योंकि -
तुम्हें ..
मेरा पुतला .. जलाने ... देखने ... तालियाँ बजाने ...
की आदत-सी हो गई है ... !

गर .. दम है ... तो ....
जला के दिखाओ ... उसे .. उन्हें ... जिनमें मैं ....
आज भी ज़िंदा हूँ .. जी रहा हूँ ....
हाँ .. सच ... मैं .. रावण हूँ .... अजर हूँ .. अमर हूँ .... !!!

Friday, September 29, 2017

संघर्ष

"जीवन का दूसरा एक नाम संघर्ष भी है ... यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण जरूर लगता है पर यह सच है कि .. जीवन की राह / राहें बेहद कठिन हैं ... जन्म से लेकर मृत्यु तक कदम-कदम पर संघर्ष है ....

ऐसा नहीं है कि ऐसे हालात सब के लिए हैं / होते हैं .... संसार में लगभग 10% ऐसे लोग भी हैं / होते हैं जिनके जीवन की राहें 'बाय बर्थ' नेशनल हाइवे की तरह स्मूथ होती हैं अर्थात ये लोग राजयोग में पैदा होते हैं जिनके जीवन में संघर्ष का कोई स्थान ही नहीं होता ...

खैर .. छोडो ... राजयोग की बातों में पड़ना उचित नहीं है ... सच तो ये है कि हम सभी कर्म प्रधान जीवन जी रहे हैं कर्म ही हमें अपने लक्ष्य पर पहुँचा सकते हैं, हमें सुख और शान्ति दे सकते हैं ....

हमारे कर्म व हमारी सोच कितनें सकारात्मक हैं ये हमारे जीवन व संघर्षों का निर्धारण करेंगे / करते हैं ... कर्म व सोच की सकारात्मकता वह ऊर्जा है जो संघर्षों को सुख व शान्ति में बदल देती है ....

सकारात्मक सोच .. सकारात्मक कर्म ... सकारात्मक आहार अर्थात विटामिन व मिनरल्स युक्त पौष्टिक आहार ... हमारे तन और मन को ऊर्जा प्रदान करते हैं ... संघर्षों से मुक्त करते हैं ....

हम अच्छे स्वास्थ्य के लिए कितने सजग हैं ... देखें .. जाँचें ... परखें .. और हमेशा सजग रहें ....
स्वस्थ्य रहें, मस्त रहें ....
स्वस्थ्य हैं तो जान है ... जान है तो जहान है !"

~ श्याम कोरी 'उदय'

Tuesday, September 26, 2017

सेहत व तंदुरुस्ती

मित्रों .....
आज मैं एक ऐसे विषय पर चर्चा करने जा रहा हूँ जो हमारी सेहत व तंदुरुस्ती के लिए बेहद आवश्यक है .. बचपन में .. हम .. अक्सर ...

कुछ भोज्य पदार्थों को बहुत पसंद व चाव से खाते हैं .. और कुछ भोज्य पदार्थों को सामने देखते ही नाक-मुंह सिकोड़ने लगते हैं ...  उदाहरण के तौर पर कुछ लोग भिन्डी नहीं खाते .. कुछ करेला नहीं खाते .. बगैरह-बगैरह ...

इस तरह की आदतें बड़े हो जाने पर भी कुछ लोगों में बनी रहती हैं .. बड़े होने के बाद भी कुछ लोग कुछेक भोज्य पदार्थों को देखकर नाक-मुंह सिकोड़ते देखे जाते हैं ...

इस विषय पर मेरा चर्चा का आशय मात्र इतना है कि .. जितना मैंने भोज्य पदार्थों में पाये जाने वाले विटामिन्स व मिनरल्स के बारे में पढ़ा व सुना है ... उसके अनुसार प्रत्येक भोज्य पदार्थ हमारी सेहत के उपयोगी व महत्वपूर्ण है ...

हम .. दूध से, घी से, शहद से, करेला से, भिन्डी से, नीबू से, मैथी से, इत्यादि भोज्य पदार्थों से ... परहेज करना छोड़ दें ... सभी को गले से लगायें, सभी का सेवन आरम्भ करें .. भले छोटी-छोटी मात्रा में करें ... पर सेवन जरूर करें...

यहाँ .. मैं यह नहीं कह रहा कि प्रतिदिन खायें ... एक टारगेट बना लें कि प्रति सप्ताह खाना है या माह में कम से कम दो बार जरूर खाना है ... यह सेवन हमें वो विटामिन्स व मिनरल्स देगें जो हमारे अच्छे स्वास्थ्य के लिए अति-आवश्यक हैं ....

एक समय के बाद .. यदि हमें कड़वी दवाईयां खाने से बचना है ... शॉपिंग मॉल की तरह तने व्यावसायिक अस्पतालों में जाने से बचना है .. तो ... हमें अपनी सेहत का स्वयं ध्यान रखना होगा ... नहीं तो .... उफ्फ .....

लापरवाही .. लापरवाहियां ... उफ्फ ....
स्वस्थ्य हैं तो जीवन है ... जान है तो जहान है .... !

~ श्याम कोरी 'उदय'

Monday, September 11, 2017

अनुभव व शोध

प्रिय मित्रों

वैज्ञानिक चिकित्सा हो ...
या आयुर्वेदिक चिकित्सा हो ...
या हों दादा, दादी, नाना, नानी के घरेलु उपचार ...

लगभग सभी उपचार अपने-अपने अनुभव व शोध पर आधारित हैं, .. कहीं शोध ज्यादा तो अनुभव कम है ... कहीं अनुभव ज्यादा तो शोध कम है .... तो कहीं-कहीं शोध और अनुभव दोनों का पर्याप्त मिश्रण है ....

मेरे अनुभव अनुसार वह उपचार श्रेष्ठ है जहां अनुभव और शोध दोनों का पर्याप्त मिश्रण है .... व्यवहारिक अनुभव की कमी की स्थिति में आधुनिक वैज्ञानिक उपचार भी उतना कारगर नहीं है जितना कारगर घरेलु उपचार है ....

यहाँ मेरा आशय एक उपचार को श्रेष्ठ और दूसरे को बेकार बताना नहीं है ... मेरा आशय यहां अनुभव व शोध से मिश्रित उपचार को श्रेष्ठता की श्रेणी में रखने व तौलने से है ... जहाँ किसी एक चीज की भी कमी है वहाँ श्रेष्ठता की भी कमी है .. ऐसा मेरा मानना है, मेरा अनुभव है ....

लगभग सभी उपचार समान तथ्यों पर आधारित हैं ... उदाहरण के तौर पर यदि 'शुगर' की बीमारी है तो सभी उपचार - अंग्रेजी, देशी, घरेलु, इत्यादि ... सभी हमें मीठी वस्तुएँ खाने से रोकते हैं तथा ऐसी दवा देते हैं जो हमारे शरीर में शुगर की उत्पन्नता को रोकें .....

जहाँ तक मेरा मानना है अर्थात मैंने अनुभव किया है .. लगभग सभी उपचार के तरीकों में शामिल होने वाली दवाइयों में रोग को मारने वाले तत्वों का मिश्रण लगभग एक समान ही होता है ... कहीं थोड़ा ज्यादा तो कहीं थोड़ा कम ....

यहाँ मेरा आशय 'कान को पकड़ने' से है ... कोई 'कान' को सीधा पकड़ रहा है तो कोई हाथ घुमा कर पकड़ रहा है .... कोई 'कान' को जोर से पकड़ रहा है तो कोई हल्के से ..... उपचार के तरीके व तत्व ( इंग्रीडिएंस, फार्मूले ) लगभग एक समान हैं ......

समय पर उपचार के लिए पहुँचना .. उपचार हेतु श्रेष्ठ माध्यम प्राप्त होना .... श्रेष्ठ व सर्वोत्तम उपचार के लिए आवश्यक हैं .... लापरवाही बीमार व्यक्ति और उपचार कर्ता दोनों के लिए घातक है .....

लापरवाही ... उफ्फ ......
स्वस्थ्य रहें, खुश रहें ... जान है तो जहान है ..... !

~ श्याम कोरी 'उदय'

Saturday, September 9, 2017

वक्त का ठहराव

"वैसे तो ...
वक्त का ठहराव ...
जिन्दगी का ठहराव ...
वक्त और जिन्दगी दोनों का संयुक्त रूप से ठहराव ...

उपरोक्त ठहराव के पल जीवन के वे कठिन पल होते हैं जो मनुष्य को 'दिन में तारे दिखा देते हैं' .. दिन में तारे दिखा देना या देख लेना का आशय आप समझ रहे होंगे ....

कभी वक्त ठहर जाता है .. तो कभी जिन्दगी ठहर जाती है ... ऐसा अक्सर मानव जीवन में समय-समय पर होते रहता है .. इंसान समय-समय पर ऐसे दौर से गुजरता रहता है ... गुजर जाता है .... लेकिन .. किन्तु ...

वक्त और जिन्दगी दोनों का संयुक्त रूप से ठहराव ... बहुत कम देखने को मिलता है .. ऐसा अक्सर तब होता है जब इंसान किसी गंभीर बीमारी का शिकार हो जाता ... गंभीर बीमारी / गंभीर विकलांगता .. इंसान के जीवन व वक्त दोनों में ठहराव ले आती है ...

ये ठहराव .. एक ऐसा ठहराव होता है जो इंसान को दिन में तारे दिखा देता है अर्थात वह सब सोचने को मजबूर कर देता है जो उसकी सोच रूपी डिक्शनरी में होता ही नहीं है ....

ठहराव पर .. विचार रखने के पीछे मेरा आशय आपको प्रवचन देना नहीं है वरन आपको सचेत करना है कि ... कहीं .. यदि ... आप अपने स्वास्थ्य के प्रति अपनी जीवन शैली में तनिक भी लापरवाह हैं तो सजग हो जाएँ ....

लापरवाही .... उफ्फ .....

तन और मन स्वस्थ्य है तो जान है .. जान है तो जहान है .... !"

Tuesday, July 11, 2017

छिन्न-भिन्न

न हाल पूछा ... न मिजाज जाना ....
कि -
हम .. अंदर से ... छिन्न-भिन्न हैं ....

ये ... जाने-समझे बगैर .....

उफ़ ... उन्ने .....
लिपट के कहा हमसे .....
कि -

हम ... अंदर-ही-अंदर ....
जल रहे हैं .. भुन रहे हैं ... मर रहे हैं ....
बचा लो हमको ....

अब तुम ही बताओ ...
कि -

इन हालात में ..
हम करते क्या ..... ??
गर न सुनते उनकी .. तो करते क्या ... ???

Saturday, July 8, 2017

बेक़सूर

कुछ गवाहों की शक्ल में थे,
कुछ पुलिस के भेष में थे,
कुछ जज बने बैठे थे,

सब .. हमें ... कातिल ठहराने की जिद में थे ....

रहमत थी ...
करम थे ...
दुआएं थीं ... या कृपा .....

हम .. बेक़सूर थे ...
.... .... .... बेक़सूर निकले ..... ???

Friday, June 9, 2017

उल्लू

जब तक ...
आप उल्लू नहीं बनेंगे
लक्ष्मी आपकी सवारी नहीं करेगी

यहाँ उल्लू बनने से मतलब, उल्लू पक्षी बनने से नहीं है
रीयल लाइफ उल्लू बनने से है

रीयल लाइफ उल्लू बोले तो ?

जिसे हर कोई
उल्लू .. उल्लू .. उल्लू .. पुकार सके
जिसके हाव-भाव उल्लू जैसे हों

जो सिर्फ
उल्लू ही न हो, वरन लोगों को उल्लू बनाने वाला भी हो
प्रदेश को उल्लू बनाने वाला हो, देश को उल्लू बनाने वाला हो !

Monday, June 5, 2017

दस्तूर

जब हम अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ते हैं
तब अंधकार .. हमें ...
रोकने ..
पकड़ने ..
जकड़ने ...
की पूरी कोशिश करता है

वह कभी नहीं चाहता
कि -
हम कभी प्रकाश में जाएँ ... प्रकाश में पहुंचें ....

वजह ... ?
कुछ ख़ास नहीं .. बस वैसी ही है
जैसे ...
बुराईयाँ .. हमें ... अच्छाईयों की ओर बढ़ने नहीं देतीं
शैतानी शक्तियाँ.. हमें दैवीय शक्तियों की ओर बढ़ने नहीं देतीं
बस ... कुछ ऐसा ही दस्तूर है ... कुदरत का

गर .. हमें ...
सदैव ... प्रकाश में ...
अच्छाईयों में ... दैवीय आभा मण्डल में .. रहना है तो
हमें ... सदैव .. सजग रहना होगा
नहीं तो ...
हम .. कभी-भी ...
अंधकार से .. मुक्त नहीं हो पाएंगे ... ???

Thursday, June 1, 2017

सफ़र

बहुत दूर से .. बहुत दूर तक का .. सफ़र है
पाँव के छाले
राह के कंकड़
कोई मायने नहीं रखते,

गर .. ठहरे ...
थके ..
रुके ..
तो समझो गये .. !

क्यों ?
क्योंकि -
वक्त .. और .. मंजिलें ...
कभी .. किसी का .. इंतज़ार नहीं करतीं ... !

Monday, May 29, 2017

मील के पत्थर


यूँ तो इल्जाम लगाने वालों ने कोई कसर नहीं छोड़ी
मगर ... तेरी आँखों में बेगुनाही झलक रही थी मेरी !
...
उफ्फ .. सच्च .. वक्त गुजरा कैसे ! .. हमें भी पता नहीं
लफ्फाजियों का दौर था, .... लफ्फाजियों का दौर है !!
...
वो कुछ इस कदर लिपटे दौड़ के जिस्म से मेरे,
कि ... फिर ..... मैं मैं न रहा ..... वो वो न रहे !
...
फक्कड़ थे तो 'खुदा' थे
सल्तनत क्या मिली .. इंसा न रहे !
...
बस .. कुछ यूँ समझ लो
चापलूसी काम आ गई,
वर्ना ! आज वो ..
औंधे मुँह पड़े होते .... ?
...
अब तू
तजुर्बे-औ-हुनर की बात न कर,
कभी हम भी
मील के पत्थर थे हुजूर ....... ? 

Friday, May 26, 2017

फरेबी

कौन जानता था कि
वो
कुछ इस तरह मिजाज बदल लेंगे

पहले तो ..
घंटों लिपटे रहेंगे
दो जिस्म औ इक जान की तरह

और फिर
मुँह मोड़ लेंगे
इक अजनबी की तरह

लिपटना .. मुँह मोड़ लेना .. फिर .. पहचानना नहीं
कभी-कभी तो
उनकी इस अदा पे भी प्यार आता है

मगर सोचता हूँ
ऐसे प्यार का मतलब ही क्या .. !
जो
फरेबी हो ... ?

Thursday, May 25, 2017

गुस्ताख

सिक्का ...
था बड़ा गुस्ताख
हमने माँगा चित्त .. औ वो पट्ट आ गया,

कुछ .. इस तरह ...
उछल-कूद में
जीवन का बंठाधार गर गया,

अब .. हार क्या .. और जीत क्या ....
जो हुआ .. सो हुआ
सब .. गुड़ का गोबर कर गया,

सिक्का ..
था बड़ा गुस्ताख ...
कभी राह बदल गया .. तो कभी चाह बदल गया .. !

( नोट - वैसे तो सिक्का अपने आप में पूर्ण भाव के साथ  होता है ... लेकिन .. यहाँ सिक्का .. भाग्य औ वक्त का भाव भी अपने साथ लिए हुए है ... अर्थात सिक्का के स्थान पर भाग्य / वक्त भी पढ़ा व महसूस किया जा सकता है ... ! )

Thursday, May 18, 2017

माथाफोड़ी

माथाफोड़ी ... ?
-------------
हिन्दी में सिर्फ वे लोग ही अच्छा नहीं लिखते
जो नामी-गिरामी हैं
वे लोग भी अच्छा लिखते हैं
जिनका कोई नामो-निशान नहीं है,

सिर्फ वे लोग ही
हाइवे, रास्ते, पगडंडी नहीं बना रहे
जो छप रहे हैं, छापे जा रहे हैं
वे लोग भी
राह दिखा रहे हैं, लकीरें खींचते जा रहे हैं
जो छप नहीं रहे,

लेखन की लकीरें
कितनी अमिट हैं, कितनी झंकझोरने वाली हैं
इसका निर्धारण
वे आलोचक, समालोचक, समीक्षक तय नहीं करेंगे
जो हाथों पे परोसी जा रही लेखनी पर
अपने हस्ताक्षर कर रहे हैं,

लेखनी कितनी पैनी है, धारदार है
किसकी उन्नीस .. किसकी बीस .. किसकी इक्कीस है
यह परखने के लिए, देखने के लिए
निःसंदेह ...
एयरकंडीशन में बैठे लोगों को
लू के थपेड़ों संग साक्षात्कार करते हुए
माथाफोड़ी .. माथापच्ची ... करनी पड़ेगी
वर्ना ... ???

~ श्याम कोरी 'उदय'

Sunday, May 14, 2017

एक-चालीस की आखिरी लोकल ... !

अक्सर छूट जाती हैं
बहुतों की
एक-चालीस की आखिरी लोकलें,

फिर स्टेशन के ...
अंदर .. बाहर
मंडराने ... के सिबाय ..
उनके पास ... कुछ बचता नहीं है,

कुछ पश्चाताप ..
कुछ प्रायश्चित ..
भी साथ होता है .. जो ...
दिमाग को झंकझोरते रहता है,

इसी बीच ..
कुछ कोमा में चले जाते हैं
तो कुछ .. अर्द्ध-विक्षिप्त हो जाते हैं,

बहुत बुरी स्थिति हो जाती है
मन की .. तन की ...
एक-चालीस की आखिरी लोकल छूट जाने से,

वो इसलिये कि -
मेल .. एक्सप्रेस .. सुपर-फास्ट .. इत्यादि ...
पहले ही छूट चुकी होती हैं ... !!!

( नोट - यहाँ आखिरी लोकल से अभिप्राय आखिरी प्रेमिका से है .. हुआ दरअसल ये कि दो दिन पहले मेरे एक मित्र की आखिरी प्रेमिका की शादी हो गई ... बातचीत के दौरान जब मुझे पता चला तो मेरे जेहन में मुम्बई की आखिरी लोकल बिजली की तरह कौंध पडी ... फिर लिखते लिखते .. बाद के हालात पे एक कविता बन गई ... जो आपके समक्ष प्रस्तुत है .... )

Saturday, May 13, 2017

कर्जदार हैं .. पर ... भगोड़े नहीं हैं !!

हाँ .. हम ... औघड़ हैं .. फक्कड़ हैं
किसान हैं ... मजदूर हैं ...
पर ..
किसी बैंक के भगोड़े नहीं हैं,

गाँव ... खलिहान ...
पीपल तले ..
तो कभी .. नदी के तट पे ...
हर पल .. हर क्षण ... हाजिर खड़े हैं,

देश छोड़ के चले जाएँ
हम .. ऐसे व्यापारी नहीं हैं
हाँ .. हम ...
कर्जदार हैं .. पर ... भगोड़े नहीं हैं !!

Thursday, May 11, 2017

खासियत ...

यही तो खासियत है हमारी, कि -
न हम धार्मिक हैं
न नास्तिक हैं,

गर हम कुछ हैं ... तो ..
सात्विक हैं
मानविक हैं,

दिल के .. किसी न किसी कोने से ..
हम ही गौतम
हम ही महावीर हैं,

हम ही ..
नानक ... अल्लाह ... यीशु हैं ...
हम ही काल .. हम ही महाकाल हैं !

Tuesday, May 9, 2017

हम समंदर हैं ...

हम थकते नहीं हैं .. हारते भी नहीं हैं ...
बस तनिक ठहर जाते हैं,

ज़रा इंतज़ार करो .. हम फिर से उठेंगें ...
तूफ़ाँ की तरह ... सैलाब की तरह,

यही तो फितरत है हमारी ...
वो हमारे खौफ से वाकिफ हैं .. मिजाज से वाकिफ हैं,

हम समंदर हैं ...
यही तासीर है हमारी ... यही मौज है हमारी ..... !

Wednesday, May 3, 2017

तिकड़मबाजी ...

01
गर ये दिल टूटेगा तो
कई हिस्सों में .. कईयों का हो जायेगा,

तू .. काफी सोच-समझकर ...
अपने दिल में ..
इस दिल से .. खेलने का ख्याल लाना !
.......
02
मुहब्बत के तिकड़मबाजी रिवाजों से
हम अंजान थे 'उदय'

वर्ना ! मजाल थी किसी की
जो ... हमारे दिल से यूँ खेल जाता !!
.......
03
दर्द ..
जख्म ..
रुस्वाईयाँ .. तन्हाईयाँ ...
सब मेरे थे,

वजह .. मत पूछो ...
बस .. तुम .. चहरे पे उनके .. उनकी मुस्कान देखो ... !

Thursday, April 27, 2017

संकल्प ...

न अस्त ... न व्यस्त ... न त्रस्त ...
हो जीवन .. मेरा .. तेरा ..

तुम भी
जब चाहो तब मिलो मुझसे

मैं भी
हमेशा उपलब्ध रहूँ तुम्हारे लिए

जीवन में
हमेशा .. मौज-मस्ती .. बनी रहे

जीवन ...
हमेशा हँसता रहे .. बढ़ता रहे ...

आओ ... कुछ ऐसा ...
संकल्प लें .... हमेशा के लिए .... ?

Wednesday, April 26, 2017

भोंपू ...

कविता : भोंपू
----------------
भोंपुओं की जरुरत क्या है
देवालयों में ..
इबादतों में ..

क्या हम ..
मन से .. मौन से .. आस्था से ..
ईश्वर का .. साक्षात्कार नहीं कर सकते ?

क्या हमें .. ढोंग की जरुरत है
भोंपू की जरुरत है
पूजा के लिए .. इबादत के लिए ..... ??

Saturday, April 22, 2017

झूठ की आत्मा नहीं होती ...

जो सच है ... वह सदा सच ही रहेगा
इसीलिये कहते हैं ..
सदैव सच के साथ चलो ....

क्यों ? .. क्योंकि -
झूठ .. झूठ होता है ...

झूठ की .. आत्मा नहीं होती
दिल नहीं होता .. धड़कनें नहीं होतीं

झूठ .. कभी दो कदम पे ..
तो कभी दो दिनों में ..
दम तोड़ देता है
नंगा .. बेपर्दा हो जाता है

जब .. तुम .. हम .. सभी .. जानते हैं

फिर क्यों ... हम ..
झूठ की उंगली पकड़ लेते हैं
झूठ को अपना सहारा बना लेते हैं
... क्यों .. क्यों .. क्यों ... ???

Thursday, April 20, 2017

मील के पत्थर ...

01
उसूल औ ख़्वाब
दोनों ... जरूरी हैं जिन्दगी में

वर्ना ...
जिन्दगी बेमतलब-सी ..

नीरस-सी ..
गुजरते रहेगी .. गुजर जायेगी ..

सब .. देखते रहेंगे ...
हम .. देखते रह जाएंगे ... ?
-------
02
अब तू
तजुर्बे-औ-हुनर की बात न कर,
कभी हम भी
मील के पत्थर थे हुजूर ....... ?
-------
03
बस .. कुछ यूँ समझ लो
चापलूसी काम आ गई,
वर्ना ! आज वो ..
औंधे मुँह पड़े होते .... ?

Friday, April 14, 2017

जो तुम कहो ...

01
काश ! तुझसा होता
कोई दूजा

तो ..
यकीन मान, इतनी बेचैनियाँ न होतीं

बात ... तुझसे बिछड़ने की नहीं है
तेरी चाहत की भी नहीं है

बात .. तुझसे हमसफ़र की है
तुझसे .. हमदम ... हमकदम की है .... ?
-------
02
मिजाज बदलें ...
ख्यालात बदलें ...
या ख़्वाहिशें बदल लें ...

जो तुम कहो ... ?
-------
03
भोर तो होनी ही है
जो जल्द ही हो जायेगी ...

नींद जब खुल ही गई
तो .. चल .. बढ़ें ... मंजिल की ओर

कुछ पगों का फासला
कुछ और कम हो जाएगा ...

चल .. बढ़ें ... मंजिल की ओर
भोर तो होनी ही है ... ? 

Monday, April 10, 2017

ईमान के पग ...

भले कुछ भी हो जाए .. 
पर .. हम .. जीते जी नहीं मरेंगे, 

भृष्टाचार की आंधी में .. 
कभी ... हम नहीं बहेंगे ..... 

लोग लगा दें .. चाहे जो कीमत 
पर .. स्वाभीमान का सौदा हम नहीं करेंगे, 

घुप्प अंधेरे हों .. या हो दूधिया चका-चौंध ... 
पर .. हमारे .. ईमान के पग .. कभी नहीं डगेंगे ... 

झूठी शान .. औ .. चका-चौंध की खातिर 
हम .. जीते जी नहीं मरेंगे .... ? 

भले कुछ भी हो जाए .. पर ... 
हमारे .. ईमान के पग .. कभी नहीं डगेंगे ... ??

Sunday, April 9, 2017

जिन्दगी ..

बहुत आसान था
मौज की जिन्दगी जीना,

मगर .... मैंने .....
ईमान नहीं बेचा .. ईमानदारी नहीं बेची,

जज्बात नहीं बेचे .. ख्यालात नहीं बेचे
लोगों ने चाहा बहुत .. पर ... स्वाभिमान नहीं बेचा,

खैर .. जो हुआ सो हुआ
रोटी .. रूखी-सूखी सही .. पर कभी भूखा नहीं सोया,

पर ... उसूल.. उसूल रहे
मैं.. मैं रहा ...

न हारे कभी .. न जीते कभी
चलते रहे .. बढ़ते रहे .. पर ... सच ....

बहुत आसान था
मौज की जिन्दगी जीना ..... ?

Friday, April 7, 2017

ज्योति ...

राम भी हैं मौन में
औ ...
है उनका पालना भी शांत,

जन्मभूमि पर 'उदय'
फैला अंधकार है,

कोई तो ...
ज्योति जलाये ..
ज्ञान की .. प्रकाश की ... ?

Wednesday, March 29, 2017

Life ...

life is a race of without goal
because ...
death is defenitely not a goal

then ...
why we are racing ..
why we are running ...

why we are not smoothly enjoying life
without fear ... without greed ...

why ...
why we are not living for eachother ... ?
Why we are not being honest ... ??
Why ... why ... why ... ???

Friday, March 17, 2017

प्रिय अरविंद ..... जब तुम्हारे पास पंजाब में सीएम कैंडिडेट नहीं था तो चुनाव में कूदे क्यों ?

प्रिय अरविंद ..... जब तुम्हारे पास पंजाब में सीएम कैंडिडेट नहीं था तो चुनाव में कूदे क्यों ?
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प्रिय अरविंद .... तुम्हारा पंजाब चुनाव लड़ने वाला कदम बेहद ही चौंकाने वाला था, चौंकाने वाला इसलिये कि जब तुम्हारे पास मुख्यमंत्री पद के लिये उम्मीदवार ही नहीं था तो तुमने यह कैसे सोच लिया कि तुम चुनाव जीत जाओगे ?

क्या तुम भी अपने आप को भाजपा व कांग्रेस जैसी स्वयं-भू पार्टी समझने लगे हो ? ... या फिर कहीं ये सोच कर तो नहीं कूद गए कि तुक्के में तीर लग जायेगा ? .... मेरा तो मानना है कि इस चुनाव से तुमने एक ऐसी पटकनी खाई है जिसकी भरपाई मुझे दूर दूर तक नजर नहीं आती !

खैर ... जो हुआ सो हुआ .... लेकिन .. किन्तु .. परंतु ... इस चुनाव के माध्यम से अर्थात विजयी नतीजों से तुम 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए एक मजबूत विपक्ष / विकल्प के रूप में उभर कर आ सकते थे, किन्तु आप अदूरदर्शी व उपेक्षापूर्ण रणनीति के कारण इससे चूक गए !

अब आपकी पार्टी का स्वरूप व सोच एक अन्य राजनैतिक पार्टी के जैसा होते जा रहा है ... यदि समय रहते आपकी नीतियों व रणनीतियों में पैनापन नहीं आया तथा एकाद और किसी चुनाव के नतीजे आपकी अदूरदर्शिता व उपेक्षापूर्ण नीति के कारण हाथ से निकल गए तो समझ लेना कि .... अब खेल ख़त्म हुआ ... ?

Sunday, March 12, 2017

असहज चुनाव और सहज नतीजे ...... जीती भी जनता और हारी भी जनता !

असहज चुनाव और सहज नतीजे ..... वाह क्या बात .... जीती भी जनता और हारी भी जनता !
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे बिलकुल वैसे ही हैं जैसे 2014 लोकसभा चुनाव के नतीजे थे ...  चौंकने वाले ... और चौंकाने वाले .... दोनों ही चुनावों में न तो कोई लहर थी और न ही किसी बवंडर के संकेत थे ... मगर ... नतीजे बवंडर की तरह आये और बड़ी-बड़ी हस्तियों औ सियासतों को उड़ा कर ले गए ।

न तो देश के एक बुद्धिजीवी वर्ग को वे नतीजे हजम हुए थे और न ही आज के नतीजे हजम हो पाएंगे ... ऐसा मेरा मानना है, ऐसा मेरा अनुमान है ... और तो और 2014 लोकसभा चुनाव के नतीजे बहुतों को तो आज तक हजम नहीं हो पाये हैं ... फिर न जाने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे कैसे हजम हो पाएंगे .... ?

खैर ... बहुत सी चीजें, बहुत से नतीजे, बहुत सी हारें, बहुत सी जीतें .. अक्सर बहुतों को हजम नहीं हो पाती हैं ... सबसे चौंकाने वाली बात तो .. कभी-कभी वो हो जाती है कि .. जीतने वाले को भी जीत की मूल वजह मालूम नहीं होती है और वह इस गलत फहमी में खुश व मदमस्त रहता है कि ... जीत की वजह वह खुद है ... ?

असहज चुनावों के सहज नतीजों व गलत फ़हमियों के तिलस्मी किले जब टूटते हैं तो ... वैसे ही टूटते हैं जैसे मुट्ठी से रेत फिसलती है ..... यदि समय रहते जीतने वाले की गलत फहमियां दूर हो जाएँ तो ठीक है .... वर्ना ... हमने बड़े-बड़े किले ढहते देखे हैं फिर वो तिलस्मी किले हों या सामान्य किले .... ?

Friday, February 24, 2017

तांडव ...

जहर को मारना है तो जहर पीना पडेगा
धधकते कोलाहल का हमें शंखनाद करना पडेगा

अगर कूदे नहीं तो ये रणभूमि धरा को लील लेगी

औघड़ बनें या काल हम
तांडव की विकराल राह पर अब हमें चलना पडेगा ?

किसे छोड़ें .. किसे मारें ... नहीं शेष सवाल अब ?

जो भी चिंघाड़ता औ रक्त का प्यासा नजर आये
उसका सिर हमें धड़ से अलग करना पडेगा

धरा औ धर्म के अस्तित्व हेतु .. हमें तांडव करना पडेगा ?

Thursday, February 2, 2017

फरेबी ...

सच ! आज फिर .. वो हमें .. कुछ याद से आ गए
पता नहीं, रूठ के हमसे... वो किस हाल में होंगें ?
...
सच ! आज जरुरत नहीं है आसमां में सुरागों की
कुछ पत्थर जमीं पर ही तबियत से उछालो यारो ?
...
न खता थी, न कुसूर था, मगर अफसोस 'उदय'
'खुदा' भी अब खामोश है.. सजा देने के बाद ?
...
वक्त गुजरा, कारवाँ गुजरा, अब तो गुबार भी गुजर गया
उफ़ ... मगर खामोशियाँ उनकी 'उदय' ..... ठहरी रहीं ?
...
न दिलों की बात कर, न जुबाँ की बात कर
सच 'उदय' .. हर राह .. वो फरेबी निकले ?